ईरान के लिए तार भी है हथियार, चाह ले तो दुनिया पर ब्रेक लगाने का रखता है दम!
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच जंग को आज यानी गुरुवार (19 मार्च) को 20 दिन हो गए. 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था, जिसमें सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे. इसके बाद ईरान ने भी पलटवार किया. बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, जिसका सीधा असर तेल और गेस की सप्लाई पर पड़ा. लेकिन इन ऊपरी चिंताओं के नीचे एक कहीं ज्यादा शांत और शायद ज्यादा विनाशकारी संकट छिपा है.
बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि फारस की खाड़ी और लाल सागर (रेड सी) के नीचे समुद्र तल पर हजारों किलोमीटर लंबे फाइबर-ऑप्टिक केबल बिछे हुए हैं. समुद्र के नीचे बिछे ये केबल असल में दुनिया के डिजिटल जगत की रीढ़ हैं. ये केबल 95% से अधिक इंटरनेशनल डेटा ट्रैफिक को ले जाते हैं, जिससे वे वैश्विक कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं. जब आप दुनिया के किसी दूसरे कोने में किसी को ईमेल भेजते हैं तो आप पानी के नीचे बिछी इन्हीं लाइनों पर निर्भर होते हैं.
टेंशन में एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देश!
जिन देशों की अर्थव्यवस्था डिजिटल मिडियम पर बहुत ज्यादा निर्भर है उनके लिए स्थिति सचमुच चिंताजनक नजर आ रही है. एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देश एक-दूसरे से जुड़ने के लिए उस डेटा के फ्लो पर निर्भर हैं, जो लाल सागर और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है.
एक ओर जहां ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है, वहीं लाल सागर में भी हालात बिगड़े हुए हैं. हूती गुट ने ईरान के साथ एकजुटता दिखाते हुए जहाजों पर फिर से हमले शुरू करने की धमकी दी है. इंटरनेट के दौर से पहले यह शायद महज एक ऊर्जा संकट होता, लेकिन अब यह कहीं ज्यादा जटिल मामला बन गया है.
जहाजों को भेजना खुदकुशी करने जैसा
इन केबल के लिए वास्तविक खतरा सैन्य हमलों से नहीं बल्कि जंग की अराजकता से ही पैदा होता है. जब जहाजों पर हमला होता है या उन्हें मिसाइलों और ड्रोन से बचने के लिए बचाव कार्रवाई करनी पड़ती है, तो उनके एंकर समुद्र तल पर घिसटते हैं. ये घिसटते हुए एंकर कुछ ही सेकंड में केबल को काट सकते हैं. शांति के समय जहाज कुछ ही दिनों में खराब केबल का पता लगाकर उसे ठीक कर सकते हैं, लेकिन अब वे जहाज डॉक पर खड़े हैं.
ईरान की सेना ने साफ कर दिया है कि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को भेजना खुदकुशी करने जैसा है. जो चीज आमतौर पर सर्विस में कुछ समय की रुकावट होती, वो अब कई देशों के लिए महीनों तक चलने वाले गंभीर इंटरनेट स्लोडाउन और डिजिटल ब्लैकआउट में बदल सकती है.
डेटा आइलैंड बनकर रह जाएंगे सऊदी-UAE!
आर्थिक असर सिर्फ वीडियो बफर होने या ईमेल में देरी तक ही सीमित नहीं है. अमेरिका की कई नामी कंपनियों ने मिलकर UAE और सऊदी अरब में बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाने में अरबों डॉलर लगाए हैं. इन कंपनियों को पूरा भरोसा था कि खाड़ी क्षेत्र दुनिया का अगला बड़ा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हब बनेगा, जो एशिया, अफ्रीका और यूरोप के ग्राहकों को सेवा देगा.
अगर इन अरबों डॉलर की सुविधाओं को बाकी दुनिया से जोड़ने वाली फिजिकल केबल कट जाती हैं, तो ये अलग-थलग पड़े डेटा आइलैंड बनकर रह जाएंगे. दुनिया भर में AI से जुड़े काम ठप पड़ जाएंगे. क्लाउड सर्विस की क्वालिटी गिर जाएगी. सप्लाई चेन टूट जाएगी.
क्या भारत पर भी पड़ेगा असर?
भारत तेजी से अपने क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बुनियादी ढांचे का विस्तार कर रहा है. इस मामले में वो भी संवेदनशील स्थिति में है. खाड़ी क्षेत्र में स्थित विशाल डेटा सेंटर पर आधारित देश की AI से जुड़ी महत्वाकांक्षाएं सीधे तौर पर युद्ध क्षेत्र के दायरे में हैं. इन डेटा सेंटर की डिजिटल लाइफलाइन्स ऐसे समुद्री जलक्षेत्रों से होकर गुजर रही हैं, जिन पर विभिन्न पक्षों के बीच विवाद बना हुआ है.
भारत का एक बड़ा इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक यूरोप पहुंचने से पहले अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद केबल सिस्टम के जरिए पश्चिम की ओर जाता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भारत का लगभग एक-तिहाई पश्चिमी डेटा ट्रैफिक उन नेटवर्कों से होकर गुजरता है, जो होर्मुज स्ट्रेट से होकर या उसके करीब से जाते हैं. SEA-ME-WE 4 (SMW4), I-ME-WE (IMEWE) और Flag Telecom के FALCON जैसे सिस्टम इस क्षेत्र के जरिए भारत को वैश्विक नेटवर्क से जोड़ते हैं.
यही बुनियादी ढांचा कुवैत, कतर, बहरीन, इराक और संयुक्त अरब अमीरात सहित खाड़ी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी प्रदान करता है. अगर होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और बढ़ता है तो इन क्षेत्रों को ग्लोबल नेटवर्क से जोड़ने वाले डिजिटल लिंक गंभीर रूप से बाधित हो सकते हैं.
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