स्थानीय समीकरण या बाहरी उम्मीदवार… आरा-बक्सर विधान परिषद सीट पर क्यों हुई JDU की हार?

आरा बक्सर स्थानीय प्राधिकार विधान परिषद की सीट पर हुए उपचुनाव और उसमें जनता दल यूनाइटेड (JDU) के प्रत्याशी की हार के बाद से एक तरफ जहां एनडीए खेमे में थोड़ी निराशा है, वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिल रहा है. दरअसल इस सीट को आरजेडी ने जेडीयू से छीन लिया है.

आरजेडी प्रत्याशी की यह जीत विधान परिषद और विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद एक नई उम्मीद की किरण बन कर उभरा है. दरअसल इस सीट पर राधाचरण शाह उर्फ सेठ जी जनता दल यूनाइटेड के एमएलसी थे. पिछले साल राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड ने उन्हें संदेश विधानसभा सीट से अपना उम्मीदवार घोषित किया था. जहां उन्होंने आरजेडी के अरुण यादव को टक्कर दी थी और जीत हासिल की थी.

दिलचस्प है राधा चरण की कहानी

जलेबी की दुकान चलाने वाले राधा चरण शाह उर्फ सेठ जी का दुकानदार से एमएलसी बनने और उसके बाद से एमएलए बनने की कहानी बहुत ही दिलचस्प है. विधायक बनने के बाद उन्होंने एमएलसी पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके कारण इस सीट पर उपचुनाव हुआ. बिहार विधान परिषद की इस सीट पर एक तरफ जहां राधाचरण शाह के बेटे कन्हैया प्रसाद जेडीयू के उम्मीदवार थे.

वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन समर्थित प्रत्याशी के रूप में आरजेडी से सोनू कुमार राय अपनी दावेदारी ठोक रहे थे. हालांकि इस सीट पर सोनू राय ने 359 मतों से जीत हासिल की और सबको अचंभित कर दिया. दरअसल इस सीट पर लगातार राधा चरण शाह जीत दर्ज करते रहे थे. ऐसे में उनकी हर को एनडीए अभी तक पचा नहीं पा रहा है.

क्यों हुई जेडीयू की हार?

बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद जेडीयू के लिए इस प्रतिष्ठित सीट पर मिली हार के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. जिसमें सबसे प्रमुख कारण बाहरी या पैराशूट उम्मीदवार है. दरअसल स्थानीय लोगों की मानें तो कन्हैया प्रसाद का इस सीट पर उम्मीदवार बना बनाया जाना जेडीयू के लिए घातक साबित हुआ. स्थानीय लोगों की मानें तो इस सीट पर मनोज उपाध्याय अपनी तैयारी कर रहे थे लेकिन एन वक्त पर कन्हैया प्रसाद को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. इस बात को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ लोगों में भी नाराजगी थी.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो बागी उम्मीदवार मनोज उपाध्याय की इस बेल्ट में अच्छी पकड़ मानी जाती है. वह लंबे वक्त से इस चुनाव के लिए तैयारी भी कर रहे थे. इस चुनाव में मनोज उपाध्याय को 636 वोट मिले, जबकि सोनू राय को 340 मतों से जीत हासिल हुई. यानी बागी उम्मीदवार के रूप में मनोज राय की दावेदारी जेडीयू उम्मीदवार के लिए घातक साबित हुई.

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में यह बात भी सामने आ रही है कि कार्यकर्ताओं और नेताओं की नाराजगी इस बात को लेकर भी थी कि कन्हैया प्रसाद को जब उम्मीदवार घोषित किया गया, तब तक वह जेडीयू के सदस्य भी नहीं थे. बताया तो यहां तक जा रहा है कि उन्हें पहले उम्मीदवार घोषित किया गया और रातों-रात जेडीयू की सदस्यता दिलाई गई.

वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन ने इस सीट को अपने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया और माइक्रो लेवल तक अपनी तैयारी की. इसमें बक्सर के आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह की भूमिका अहम मानी जा रही है. इसके अलावा कई अन्य कारण भी बताई जा रहे हैं. क्षेत्र में माले नेता अजीत कुशवाहा का प्रभाव और महागठबंधन के कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने चुनाव को पूरी तरह मुकाबले में ला दिया.

खुलकर सामने आई राजपूत मतदाताओं की नाराजगी

कहा यह भी जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में हार चुके अजीत कुशवाहा ने संगठनात्मक स्तर पर कुछ ऐसा माहौल बनाया जो महागठबंधन के पक्ष में चला गया. पिछले लोकसभा चुनाव में जब वैश्य मतदाताओं ने गोलबंदी की थी और माले समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था तब राजकुमार सिंह जैसे बड़े नेता को भी हार का सामना करना पड़ा था. उस क्षेत्र में राजपूत मतदाताओं की नाराजगी भी खुलकर सामने आई थी.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो पिछले लोकसभा चुनाव में जब राजकुमार सिंह अपनी दावेदारी ठोक रहे थे तब एनडीए के विधायकों और खुद राधा चरण शाह ने भी अपेक्षित सहयोग नहीं किया था. इस बात को लेकर के भी स्थानीय सवर्ण मतदाताओं में नाराजगी थी. जिसे लेकर उन्होंने इस विधान परिषद की सीट पर हुए उपचुनाव में बेरुखी दिखा दी. इसके अलावा स्थानीय बड़े नेताओं के साथ-साथ एनडीए विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं में भी इस बात को लेकर के तबसे आक्रोश था.

 

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