क्या है अंबुबाची मेला? जब धरती मां 3 दिनों तक करती हैं आराम, जानें 2026 में कब से कब तक होगा आयोजन

 सनातन धर्म में कई ऐसे धार्मिक पर्व और परंपराएं हैं, जो न सिर्फ आस्था बल्कि प्रकृति और जीवन दर्शन से भी जुड़ी हुई हैं। इसकी सबसे बढ़िया मिसाल है मां कामाख्या मंदिर का अंबुबाची मेला। यह आयोजन बेहद खास माना जाता है। चलिए जानते हैं कि आखिर क्या है अबुंबाची मेला, जब धरती मां 3 दिनों तक आराम करती हैं। साथ ही जानेंगे कि इस साल अबुंबाची मेले का आयोजन कब से कब तक होगा।

क्या है अंबुबाची मेला?

असम के गुवाहाटी स्थित मां कामाख्या मंदिर में हर साल अंबुबाची मेला आयोजित होता है। यह मेला देवी शक्ति की उपासना के साथ-साथ प्रकृति और स्त्री शक्ति के सम्मान का भी प्रतीक है। मान्यता है कि इस दौरान मां कामाख्या वार्षिक रजस्वला अवस्था में प्रवेश करती हैं। इसलिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। हर साल लाखों लोग अंबुबाची मेले में पहुंचते हैं। विशाल जनसमूह के कारण इसे अपूर्व का महाकुंभ भी कहा जाता है। 4 दिनों तक पूरा क्षेत्र भक्ति, साधना और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बना रहता है। 

कब से शुरू होगा अंबुबाची मेला 2026

साल 2026 में अंबुबाची मेले की शुरुआत 22 जून की रात से होगी और इसका समापन 26 जून की सुबह होगा। मंदिर प्रशासन ने इन तिथियों की पुष्टि कर दी है। हर साल की तरह इस बार भी लाखों श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तांत्रिक साधकों के पहुंचने की उम्मीद है, जिसके लिए विशेष तैयारियां की जा रही हैं।

आयोजन के दो प्रमुख चरण

  1. अंबुबाची मेले को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है। पहला चरण प्रवृत्ति कहलाता है। इस साल इस चरण की शुरुआत 22 जून की रात से होगी। इसके बाद 23, 24 और 25 जून तक मंदिर का गर्भगृह पूरी तरह बंद रहेगा। इस दौरान श्रद्धालुओं को देवी के दर्शन की अनुमति नहीं होती।
  2. दूसरा चरण निवृत्ति कहलाता है और इसी दिन सबसे अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस चरण के तहत 26 जून 2026 को विशेष शुद्धिकरण और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे। 

धरती मां के विश्राम की मान्यता

अंबुबाची मेले के आयोजन के पीछे धार्मिक आस्था के साथ ही प्रकृति से जुड़ा गहरा संदेश भी मिलता है। मान्यता है कि जिस तरह एक स्त्री रजस्वला अवस्था के दौरान आराम करती है, उसी तरह इस अवधि में धरती मां भी विश्राम करती हैं। यह समय मानसून के आगमन का होता है, जब धरती नई सृजन शक्ति और उर्वरता प्राप्त करती है।

आज भी मेले के दौरान कई परिवार खेती-बाड़ी, भूमि की खुदाई और कुछ शुभ कार्यों को टाल देते हैं। इसे धरती को आराम देने और उसकी सृजन शक्ति के सम्मान के रूप में देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि दिनों में प्रकृति अपनी ऊर्जा को पुनः संचित (एकत्र) करती है और इसके बाद नई फसल, हरियाली और जीवन चक्र की शुरुआत होती है।

मां कामाख्या मंदिर का रहस्य

इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां देवी की पूजा मूर्ति के रूप में नहीं होती। मंदिर के गर्भगृह में एक प्राकृतिक शिलाखंड है, जिसे योनि कुंड के रूप में पूजा जाता है। यह शिला हमेशा एक प्राकृतिक जलधारा से सिक्त रहती है। अंबुबाची मेले के दौरान इस पवित्र जल में और अधिक लालिमा दिखाई देती है, जिसे मां कामाख्या के रजस्वला होने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इन दिनों मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और विशेष धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है, जिसकी पूजा विधियों को बहुत गुप्त रखा जाता है। 

अंगोदक और अंगवस्त्र का विशेष महत्व

मेले की शुरुआत से पहले गर्भगृह में स्थापित प्राकृतिक शिला स्वरूप को लाल वस्त्र से ढक दिया जाता है। इसके बाद 3 दिनों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। मंदिर का पट बंद करते समय गर्भगृह एक सफेद कपड़ा रखा जाता है, जो 3 दिन बाद लाल रंग का हो जाता है। मान्यता है कि इन दिनों देवी की रचनात्मक ऊर्जा अपने सर्वोच्च स्तर पर होती है। 

कपाट खुलने के बाद श्रद्धालुओं को विशेष प्रसाद वितरित किया जाता है। इसमें अंगोदक यानी पवित्र जल और अंगवस्त्र यानी लाल कपड़े के छोटे टुकड़े शामिल होते हैं। इस प्रसाद को देवी कामाख्या की शक्ति और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।