कट्टर दुश्मन भारत और पाकिस्तान क्यों नहीं करते न्यूक्लियर प्लांट पर हमला? अनोखा है समझौता

न्यूक्लियर पावर प्लांट और ठिकाने, जिन्हें कभी युद्ध के समय भी हमले से दूर रखा जाता था, अब वे भी युद्ध की चपेट में आ रहे हैं। उदाहरण के लिए यूक्रेन के ज़ापोरिज्जिया न्यूक्लियर पावर प्लांट से लेकर ईरान में नतांज़, फोर्डो और इस्फ़हान जैसे ठिकानों तक, न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले या नुकसान के खतरे ने गहरी चिंता पैदा कर दी है। ईरान के बुशहर न्यूक्लियर प्लांट और संयुक्त अरब अमीरात के बराक एटॉमिक रिएक्टरों पर हुए हमलों ने पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चिंता सामने खड़ी कर दी है कि क्या आम नागरिकों के इस्तेमाल वाला न्यूक्लियर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर अब रणनीतिक हमलों से सुरक्षित है?

परमाणु ठिकानों पर हमलों ने क्यों बढ़ाई चिंता

युद्ध के दौरान इस तरह की घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। इजरायल ने पहले के दशकों में इराक और सीरिया में न्यूक्लियर ठिकानों को निशाना बनाया था। हाल ही में, अमेरिका और इजरायल ने ईरान में न्यूक्लियर से जुड़े कई ठिकानों पर हमले किए हैं और बंकर-बस्टर बमों का भी इस्तेमाल किया है। इन घटनाओं ने वैश्विक सुरक्षा के लिए एक खतरनाक नया पहलू पैदा कर दिया है। इसके परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं क्योंकि ऐसे ठिकानों को किसी भी तरह का नुकसान होने पर रेडिएशन फैलने का खतरा होता है, जो सीमाओं की परवाह नहीं करता।

क्या है भारत और पाकिस्तान की अनोखी डील?

वहीं, इस बदलते वैश्विक माहौल में भारत और पाकिस्तान का मामला खास तौर पर ध्यान खींचने वाला है। ये दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस, कहने को तो एक दूसरे के पड़ोसी हैं लेकिन इनके बीच दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है। इनके बीच कई युद्ध हुए हैं और कई मोर्चों पर इनके बीच तनाव बना हुआ है; साथ ही, कुछ समय से इनके बीच कोई कूटनीतिक बातचीत भी नहीं हुई है। हाल ही में, 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के नाम से जानी जाने वाली चार दिन की सैन्य झड़प हुई थी। फिर भी, भारी तनाव और सक्रिय दुश्मनी के बावजूद, दोनों देशों के बीच संयम का एक ऐसा पहलू है जो हमेशा कायम रहा है। न तो भारत और न ही पाकिस्तान ने कभी एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया है।

वैश्विक संधि का हिस्सा भी नहीं हैं दोनों देश

भारत और पाकिस्तान 'परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की वैश्विक संधि' (NPT) का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि, वे 31 दिसंबर 1988 को हुए 'परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले को रोकने के समझौते' से बंधे हुए हैं। प्रधानमंत्री राजीव गांधी और प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के नेतृत्व में हुआ यह समझौता जनवरी 1991 में लागू हुआ था। इसका मुख्य मकसद साफ है। दोनों पक्ष यह वादा करते हैं कि वे दूसरे देश में परमाणु प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाने या उन्हें नष्ट करने के मकसद से कोई भी काम नहीं करेंगे, न ही उसे बढ़ावा देंगे और न ही उसमें शामिल होंगे।

भारत और पाकिस्तान के बीच कब हुआ समझौता

इस समझौते के सबसे अहम पहलुओं में से एक है परमाणु ठिकानों की लिस्ट का हर साल आदान-प्रदान। हर साल 1 जनवरी को, भारत और पाकिस्तान नई दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनयिक चैनलों के ज़रिए एक साथ इन लिस्ट का आदान-प्रदान करते हैं। यह प्रक्रिया 1992 में शुरू हुई थी और बिना किसी रुकावट के जारी है। 2026 में, दोनों देशों ने ऐसी लिस्ट का लगातार 35वीं बार आदान-प्रदान पूरा किया। इन लिस्ट में नागरिक परमाणु सुविधाएं शामिल हैं, जैसे कि पावर रिएक्टर, रिसर्च सुविधाएं, फ्यूल बनाने वाली इकाइयां और अन्य लिस्टेड परमाणु ठिकाने।

स्पष्ट है भारत और पाकिस्तान की नीति

ये लिस्ट इतनी स्पष्टता के साथ शेयर की जाती हैं कि दोनों पक्ष किसी भी टकराव की स्थिति में इन ठिकानों की पहचान कर सकें और उनसे बच सकें। इस व्यवस्था ने तनावपूर्ण रिश्तों के बीच भी भरोसा और भविष्य के बारे में अंदाज़ा लगाने की क्षमता पैदा की है। नई दिल्ली में नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड (NSAB) के सदस्य और पूर्व राजदूत डी.बी. वेंकटेश वर्मा इसके महत्व को संक्षेप में बताते हैं। वे कहते हैं, "परमाणु ठिकानों पर हमला न करने का यह भारत-पाकिस्तान समझौता दुनिया में अनोखा है।" वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वैश्विक परमाणु व्यवस्था में ऐसी प्रतिबद्धता कितनी दुर्लभ है।

गंभीर परिस्थिति में सिद्धांत कायम रखा भारत पाकिस्तान ने

यह समझौता गंभीर संकट के समय भी कायम रहा; दोनों देश अपनी प्रतिबद्धता पर अडिग रहे। यह समझौता दोनों देशों को लिस्ट में शामिल परमाणु ठिकानों के खिलाफ बल प्रयोग से रोकता है और यह पक्का करता है कि हर साल जानकारी का आदान-प्रदान इस प्रतिबद्धता को व्यावहारिक रूप से मजबूत करे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी, जब तनाव बहुत ज्यादा था और सैन्य कार्रवाई चल रही थी, परमाणु ठिकानों को निशाना न बनाने का यह सिद्धांत कायम रहा।

भारत और पाकिस्तान क्यों हैं तारीफ के काबिल?

  • भारत-पाकिस्तान समझौता दिखाता है कि जब दांव पर बहुत कुछ लगा हो, तो दुश्मन भी किसी आम सहमति पर पहुंच सकते हैं। एक स्थापित नियम और कानूनी ढांचा है कि परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं किया जाना चाहिए। ग्लोबल सुरक्षा के लिए इस नियम का पालन करना ज़रूरी है।
     
  • मुश्किल पड़ोसी होने के बावजूद, दोनों देशों ने दिखाया है कि लगातार संयम बरतना मुमकिन है। हर साल लिस्ट का आदान-प्रदान, हमला न करने का स्पष्ट वादा, और तीन दशकों से ज़्यादा समय से न्यूक्लियर नॉन-एग्रेशन एग्रीमेंट (हमला न करने का समझौता) का उल्लंघन न होना - ये सभी एक कारगर सिस्टम की ओर इशारा करते हैं।
     
  • चूंकि भारत आने वाले सालों में अपनी न्यूक्लियर एनर्जी क्षमता को काफी बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की योजना बना रहा है, इसलिए ऐसी सुरक्षा व्यवस्था और भी अहम हो जाती है। ये जोखिम की धारणा को कम करते हैं, निवेशकों और बीमा कंपनियों की चिंताओं को दूर करते हैं, और यह पक्का करते हैं कि संघर्ष के कारण अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान न पहुंचे।
     
  • ऐसी दुनिया में जहां न्यूक्लियर फैसिलिटीज़ पर लगातार खतरा मंडरा रहा है, संयम बरतने का विचार और भी अहम हो जाता है।
     
  • भारत-पाकिस्तान समझौता दोनों देशों के बीच के सभी मुद्दों को हल नहीं करता है। यह न तो संघर्ष को खत्म करता है और न ही तनाव को मिटाता है। लेकिन यह दिखाता है कि दुश्मनी भरे रिश्तों में भी, खास और केंद्रित समझौते लंबे समय तक चलने वाली स्थिरता ला सकते हैं। जैसे-जैसे दुनिया भर में न्यूक्लियर जोखिम बढ़ रहे हैं, यह सबक बहुत कीमती साबित हो सकता है।