'गे से लगता है डर', Lock Upp 2 में हर्षद चोपड़ा ने कबूला अपना सच, सूफी मोतीवाला का भी छलका दर्द
रियलिटी शोज को आमतौर पर उनके झगड़ों, विवादों और ड्रामे के लिए जाना जाता है, लेकिन नेटफ्लिक्स के रियलिटी शो 'लॉक अप: सच या सजा' के हालिया एपिसोड में एक बेहद भावुक और संवेदनशील नजारा देखने को मिला। शो के पांचवें एपिसोड में सभी घरवालों के बीच सेक्सुअलिटी, पहचान और समाज के डर को लेकर एक बेहद निजी और गंभीर बहस छिड़ गई। इस चर्चा की शुरुआत मेकर्स द्वारा दिए गए एक विषय से हुई, जिसमें पूछा गया था कि क्या सेक्सुअलिटी किसी व्यक्ति की अपनी मूल पहचान है, उसका एक हिस्सा है या फिर यह समाज के नजरिए से तय होती है? इसके साथ ही कंटेस्टेंट्स को यह चौंकाने वाला आंकड़ा भी बताया गया कि दुनिया में लगभग 70% से 95% लोग समाज के तानों और जज किए जाने के डर से अपनी असली सेक्सुअल पहचान को छुपाकर जीते हैं।
सूफी मोतीवाला का छलका दर्द
इस गंभीर मुद्दे पर बात करते हुए फैशन इन्फ्लुएंसर सूफी मोतीवाला अपने आंसू रोक नहीं पाए और उन्होंने एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के तौर पर अपने व्यक्तिगत संघर्षों को बयां किया। सूफी ने बेहद भावुक होकर खुलासा किया कि आज के दौर में भी उनके माता-पिता को लगता है कि उनमें कोई खराबी या मानसिक बीमारी है, जिसके कारण उन्हें अपने ही घर में स्वीकार्यता नहीं मिल पाई। अपनी कम्युनिटी का दर्द साझा करते हुए सूफी ने कहा कि अपने परिवार के सामने इस सच को स्वीकार करना सबसे मुश्किल काम है, कई बार तो लोगों को जबरन कन्वर्जन थेरेपी के लिए भेज दिया जाता है, जहां उनके साथ हिंसा होती है और उनका ब्रेनवॉश किया जाता है। सूफी की बातें सुनकर वहां मौजूद अभिनेता राम कपूर भी चुपचाप अपनी सहमति में सिर हिलाते दिखे। अपनी आपबीती बताते-बताते सूफी इस कदर टूट गए कि वे फूट-फूटकर रोने लगे, जिसके बाद बाकी कंटेस्टेंट्स ने उन्हें गले लगाकर संभाला।
धीरज धूपर और हर्षद चोपड़ा के अलग-अलग अनुभव
घर के दूसरे हिस्से में टीवी के दो बड़े अभिनेताओं धीरज धूपर और हर्षद चोपड़ा के बीच इस कम्युनिटी को लेकर एक दिलचस्प बातचीत हुई। धीरज धूपर ने इस विषय पर बेहद सकारात्मक नजरिया रखते हुए कहा कि वे गे लोगों के साथ उठने-बैठने में बहुत सहज महसूस करते हैं। धीरज के मुताबिक व्यक्तिगत तौर पर उनका मानना है कि इस कम्युनिटी के लोग दिल के बहुत अच्छे और संवेदनशील इंसान होते हैं। दूसरी तरफ हर्षद चोपड़ा ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि अतीत में जानकारी की कमी और डर की वजह से उनका नजरिया इस कम्युनिटी के प्रति काफी अलग था। सालों पुराना एक किस्सा याद करते हुए हर्षद ने बताया कि जब वे करियर के शुरुआती दौर में एक रैंप वॉक के सिलसिले में एक गे व्यक्ति से मिले थे तो वे इतने डर गए थे कि बहाना बनाकर वहां से भाग खड़े हुए थे। हर्षद ने कहा, 'उस समय मुझे समझ नहीं आता था और मैं बहुत डर गया था। मैंने कह दिया कि मेरा कोई शूट है, जबकि सामने वाले को पता था कि शूट कैंसिल हो चुका है, फिर भी मैं भाग गया।' हर्षद ने आगे बताया कि हाल ही में जब वे दोबारा उसी व्यक्ति से मिले तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर उससे अपनी उस पुरानी हरकत के लिए माफी मांगी और कहा कि वे उस समय इस तरह की परिस्थितियों को संभालने में परफेक्ट नहीं थे।
हर्षद चोपड़ा का पुराना बयान फिर चर्चा में
हर्षद की इस बातचीत ने शो के एक पुराने वाकये को फिर से हवा दे दी है, जिस पर सोशल मीडिया पर पहले भी काफी बहस हो चुकी है। दरअसल पिछले एक एपिसोड में कंटेस्टेंट श्रेया कालरा से बात करते हुए हर्षद ने होमोफोबिया और सामान्य डर के बीच का अंतर समझने की कोशिश की थी। उन्होंने पूछा था कि यदि कोई गे लोगों से थोड़ा डरता या झिझकता है तो क्या उसे भी होमोफोबिक कहा जाएगा, भले ही वह उस कम्युनिटी से नफरत न करता हो? इस पर श्रेया ने उनसे सीधे पूछ लिया था कि क्या वे खुद गे लोगों से डरते हैं? जब हर्षद हंसने लगे तो श्रेया ने इस कम्युनिटी से जुड़े एक बड़े स्टीरियोटाइप पर चोट करते हुए कहा था कि अक्सर लोगों को लगता है कि हर गे इंसान उन पर डोरे डालेगा, जबकि सबको एक ही चश्मे से देखना बिल्कुल गलत है।
