कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर करें ये खास उपाय, बदल जाएगी पूरे परिवार की तकदीर
आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है जो इस बार 3 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान गणेश के कृष्णपिङ्गल रूप की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं इस रूप में भगवान गणेश की आराधना करने से समस्त प्रकार के विघ्न नष्ट हो जाते हैं। इस दिन गणपति बप्पा के साथ-साथ चंद्र देव की भी पूजा होती है। व्रती इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने के बाद अपना व्रत पूर्ण करते हैं। चलिए अब आपको बताते हैं इस दिन कौन से उपाय आपका तकदीर चमका सकते हैं।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी उपाय
- अपने जीवन को आनंद से भरना चाहते हैं तो इस दिन भगवान गणेश को बूंदी के लड्डुओं का भोग लगाएं। इसके बाद बचे हुए लड्डूओं को छोटी कन्याओं में बांट दें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। ऐसा करने से छोटी-छोटी खुशियां भी आपको आनंदित करने लगेंगी।
- अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस दिन एक पान का पत्ता लें और उसके बीच में रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बना लें। इसके बाद वह पान का पत्ता भगवान गणेश को चढ़ा दें। साथ ही गणेश जी के इस मंत्र का 108 बार जप करें - ऊँ गं गणपतये नमः
- धन-धान्य और सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए इस दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश भगवान को मोदक का भोग लगाएं। साथ ही उनके किसी भी मंत्र का कम से कम 11 बार जाप करें।
- अगर आप अपने बच्चों की ग्रोथ चाहते हैं तो इस दिन भगवान गणेश की पूजा के समय एक हल्दी की गांठ लें और उसे कलावे से बांधकर पूजा स्थल पर रख दें। फिर पूजा की समाप्ति के बाद उस हल्दी की गांठ को पानी की सहायता से पीस लें और उससे बच्चे के मस्तक पर तिलक लगाएं। ऐसा करने से आपके बच्चों के जीवन की गति बनी रहेगी।
- जीवन की बड़ी परेशानी से निपटने के लिए इस दिन तिल और गुड़ के लड्डू बनाएं और उसे भगवान गणेश को भोग स्वरूप अर्पित करें। बाकि बचे लड्डुओं को प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों में बांट
- दें। ऐसा करने से आपके जीवन की परेशानियां कम होने लगेंगी।
- अगर आप अपने परिवार में सुख-शांति बनाये रखना चाहते हैं तो इस दिन अपने दोनों हाथों में लाल फूल लेकर गणेश भगवान को अर्पित करें। फूल चढ़ाते समय 'ऊँ गं गणपतये नम' मंत्र का जप करें।
- अपने किसी इच्छा की पूर्ति के लिए इस दिन भगवान गणेश को रोली और चंदन का तिलक लगाएं। साथ ही इस मंत्र का 11 बार जाप करें - वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: निर्विघ्नं कुरूमें देव सर्व कार्येषु सर्वदा
