खुद लिखी कामयाबी की कहानी, पाकिस्तान युद्ध में दिया साथ, भारत-ओमान की दोस्ती की दिलचस्प है स्टोरी
घोर संकट में दिया भारत का साथ
ओमान की दोस्ती भारत से बहुत पुरानी है, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ओमान अकेला ऐसा मुस्लिम देश था जिसने भारत का साथ दिया। जब धौंस जमाते हुए दुनिया की तमाम महाशक्तियां और दुनिया की राजनीति ने भारत को अकेला देखने की ठान ली थी और यहां तक कि अमेरिका ने भी भारत के खिलाफ समुद्र में अपना सातवां बेड़ा उतार दिया था। तब इस्लामिक दुनिया मजहबी एकजुटता के नाम पर पाकिस्तान के सुर-सुर में मिला रही थी और कूटनीति का हर दरवाजा भारत के चेहरे पर धड़ाम से बंद हो रहा था, उस वक्त अरब का यह छोटा सा देश, ओमान भारत के साथ था।
ना भीड़ देखी , ना माहौल देखा...भारत और ओमान की दोस्ती
मित्र देश भारत जब पाकिस्तान के खिलाफ जंग लड़ रहा था तो वो ओमान ही था जिसने तब ना इसने भीड़ देखी, न माहौल देखा और ना राजनीति की तंग गलियां देखीं और न ही मजहबी दबाव के आगे झुका, भारत पाक युद्ध में भारत के साथ डटकर खड़ा था ओमान। तब से लेकर आज तक भारत और ओमान की दोस्ती हर गुजरते पल के साथ और मजबूत होती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर से अपने इसी पुराने और अपने गहरे मित्र देश की यात्रा पर ने जा रहे हैं। पीएम मोदी के इस दौरे में कई अहम समझौते होने हैं, जिसमें भारत-ओमान फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर दस्तखत होना भी संभव है।
पीएम मोदी की ओमान यात्रा, लिखेगी नई इबारत
आज ओमान की दोस्ती ऐसी है कि ओमान का शाही परिवार भारत को अपना दूसरा घर मानता। ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक के पिता ने पुणे में पढ़ाई की थी, जिससे भारत के साथ इस देश के संबंधों की जड़ें और गहरी होती हैं। ओमान में आज की बात करें तो वर्तमान में इस देश में करीब 8 लाख भारतीय रहते हैं और पीएम मोदी की मौजूदगी वहां के समुदाय के लिए बड़ा संदेश होगी। भारत और ओमान के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट ( FTA ) लागू होने के बाद भारतीय टेक्सटाइल, जेम्स, ज्वेलरी और मशीनरी जैसे उत्पाद बिना टैक्स के ओमान में बिक सकेंगे। इससे भारत की एक्सपोर्ट ताकत बढ़ेगी और दोनों देशों के बीच व्यापार में तेजी आएगी।
इस्लामी काल से पहले का है ओमान का इतिहास
ओमान का इतिहास ईसा पूर्व 5000 से शुरू होता है, जो इस्लामी काल से पहले का है, जब धोफ़ार क्षेत्र लोबान व्यापार का केंद्र था। धोफ़ार अपने सबसे कीमती लोबान वृक्षों के लिए जाना जाता था, क्योंकि यहां मानसून का मौसम बहुत सुहावना होता था। ओमान के इतिहास में प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार, धोफारी वृक्षों से प्राप्त लोबान इतना विशेष था कि एक बार शीबा की रानी धोफारी वृक्षों से प्राप्त लोबान का रस लेकर राजा सुलेमान से मिलने गई थीं। लोबान की गुणवत्ता और ओमान की रणनीतिक स्थिति ने इसे फारस, भारत और अफ्रीका के क्षेत्रों के लिए व्यापार का केंद्र बना दिया था।
ओमान को पैगंबर मोहम्मद का संदेश
ओमान ने पैगंबर मोहम्मद के जीवनकाल में ही इस्लाम धर्म को अपनाया। छठी शताब्दी में, ओमान के दो राजाओं को पैगंबर मोहम्मद का एक पत्र मिला जिसमें उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। दोनों राजाओं, अब्द और जैफर ने इस पत्र का अध्ययन और विचार किया, लेकिन वे शीघ्र ही आश्वस्त हो गए और इस्लाम धर्म अपना लिया। जल्द ही, ओमान में इस्लाम को बिना किसी बाध्यता के आसानी से स्वीकार कर लिया गया। इसी कारण पैगंबर मोहम्मद ने कहा, "अल घुबैरा (ओमान के लोगों) पर अल्लाह की रहमत हो... उन्होंने मुझ पर विश्वास किया, हालांकि उन्होंने मुझे देखा नहीं था।"
सुल्तान काबूस ने ओमान को गरीबी से निकाला
ओमान ने अपनी रूढ़िवादी सोच के कारण गरीबी देखी, लेकिन सुल्तान काबूस के सत्ता संभालने के बाद ओमान की अर्थव्यवस्था में ज़बरदस्त उछाल आया। उन्होंने देश का नाम बदलकर ओमान सल्तनत कर दिया और इस देश को समग्र रूप से सशक्त बनाया। उन्होंने अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण किया और तभी से ओमान ने दुनिया के देशों में तेल का निर्यात शुरू किया, जिससे यह देश अमीर देशों की लिस्ट में शामिल हो गया। ओमान के तेल राजस्व का निवेश स्कूलों, अस्पतालों और राष्ट्रीय अवसंरचना के निर्माण में किया गया। आज ओमान समृद्ध है, अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हुए रणनीतिक साझेदारी में भी सक्षम है।
